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गेहूं की फसल में खरपतवार नियंत्रण

गेहूं की फसल में खरपतवार नियंत्रण

गेहूं उत्तर भारत की मुख्य फसल है और इसमें खरपतवार मुख्य समस्या बनते हैं। खरपतवारों में मुख्य रूप से बथुआ, खरतुआ, चटरी, मटरी, गेहूं का मामा या गुल्ली डंडा प्रमुख हैं। जिन्हें हम खरपतवार कहत हैं उनमें मुख्य रूप से गेहूं का मामा फसल को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है और इसका नियंत्रण ज्यादा बजट वाला है। बाकी खरपतवार बेहद सस्ते रसायनों से और शीघ्र मर जाते हैं। 

समय

Gehu ki fasal 

 विशेषज्ञों की मानें तो खरपतवार नियंत्रण के लिए सही समय का चयन बेहद आवश्यक है। यदि सही समय से नियंत्रण वाली दबाओं का छिड़काव न किया जाए तो उत्पादन पर 35 प्रतिशत तक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धान की खेती वाले इलाकों में गेहूं की फसल में पहला पानी लगने की तैयारी है और इसके साथ ही खरपतवार जोर पकड़ेंगे। चूंकि किसान पहले पानी के साथ ही उर्वरकों को बुरकाव करते हैं लिहाजा ऐसी स्थिति में खरपतवारों को पूरी तरह से मारना और ज्यादा दिक्कत जदां हो जाता है। विशेषज्ञ 25 से 35 दिन के बीच के समय को खरपतवार नियंत्रण के लिए उपयुक्त मानते हैं। इसके बाद दवाओं का फसल पर दुष्प्रभाव भले ही सामान्य तौर पर न दिखे लेकिन उत्पादन पर प्रतिकूल असर होता है। 

कैसे मरता है खरपतवार

Gehu mai kharpatvar 

 खरपतवार को मारने के लिए बाजार में अनेक दवाएं मौजूद हैं लेकिन इससे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि दवाओं से केवल खरपतवार ही मरता है और फसल सुरक्षित रहती है तो कैसे । फसल और खरपतवार की आहार व्यवस्था में थोड़ा अंतर होता है। फसल किसी भी पोषक तत्व का अवशोषण जमीन से सीमित मात्रा में करती है। खरतवारों के पौधों का विकास बहुत तेज होता है और वह कम खुराक से भी अपना काम चला लेते हैं। ऐसे में जो खरपतवारनाशी दवाएं छिड़की जाती हैं उनमें जिंक आदि पोषक तत्वों को मिलाया जाता है। इनका फसल पर जैसे ही छिड़काव होता है खरपतवार के पौधे उसे बेहद तेजी से ग्रहण करते हैं और दवा के प्रभाव से उनकी कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। इधर मुख्य फसल के पौध इन्हें बेहद कम ग्रहण करता है और कम दुष्प्रभाव को झेलते हुए खुद को बचा लेता है।

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खरपतवार की श्रेणी

kharpatvar 

 खरपतवार को दो श्रेणियों में बांटा जाता है। गेहूं में संकरी और चौड़ी पत्ती वाले दो मुख्य खरपतवार पनपते हैं। किसान ऐसी दवा चाहता है जिससे एक साथ चौड़ी और संकरी पत्ती वाले खरपतवार मर जाएं। इसके लिए कई कंपनियों की सल्फोसल्फ्यूरान एवं मैट सल्फ्यूरान मिश्रित दवाएं आती हैं। इस तरह के मिश्रण वाली दवाओं से एक ही छिड़काव में दोनों तरह के खरपतवार मर जाते हैं। केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार मारने के लिए टू फोर डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत दवा आती है। 250 एमएल दवा एक एकड़ एवं 625 एमएल प्रति हैक्टेयर के लिए उपोग मे लाएं। पानी में मिलाकर 400 से 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करने से तीन दिन में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार मर जाते हैं। केवल संकरी पत्ती वाले गेहूंसा, गेहूं का मामा, गुल्ली डंडा एंव जंगली जई को मारने के लिए केवल स्ल्फोसफल्फ्यूरान या क्लोनिडाफाप प्रोपेरजिल 15 प्रतिशत डब्ल्यूपी 400 ग्राम प्रति एकड़ को पानी में घोलकर छिड़काव करें।

 

सावधानी

kitnashak dawai 

 किसी भी दवा के छिड़काव से पूर्व शरीर पर कोई भी घरेलू तेल लगा लें। दस्ताने आदि पहनना संभव हो तो ज्यादा अच्छा है। दवा को जहां खरपतवार ज्यादा हो वहां आराम से छिड़कें और जहां कम हो वहां गति थोड़ी तेज कर दें ताकि पौधों पर ज्यादा दवा न जाए। दवा छिड़कते समय खेत में हल्का पैर चपकने लायक नमी होनी चाहिए ताकि खेत में नमी सूखने के साथ ही खरपतवार भी सूखता चला जाएगा।

केंद्र सरकार ने इस खरपतवार नाशी केमिकल के आयात पर लगाया बैन

केंद्र सरकार ने इस खरपतवार नाशी केमिकल के आयात पर लगाया बैन

भारत सरकार की तरफ से कम कीमत वाले 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत भर में यह निर्णय 25 जनवरी, 2024 से ही लागू कर दिया गया है। बतादें, कि 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' का उपयोग खेतों में खरपतवार को हटाने के मकसद से किया जाता है। यहां जानें ग्लूफोसिनेट टेक्निकल पर रोक लगाने के पीछे की वजह के बारे में। 

भारत के कृषक अपने खेत की फसल से शानदार उत्पादन हांसिल करने के लिए विभिन्न प्रकार के केमिकल/रासायनिक खादों/ Chemical Fertilizers का उपयोग करते हैं, जिससे फसल की उपज तो काफी अच्छी होती है। परंतु, इसके उपयोग से खेत को बेहद ज्यादा हानि पहुंचती है। इसके साथ-साथ केमिकल से निर्मित की गई फसल के फल भी खाने में स्वादिष्ट नहीं लगते हैं। कृषकों के द्वारा पौधों का शानदार विकास और बेहतरीन उत्पादन के लिए 'ग्लूफोसिनेट टेक्निकल' का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में भारत सरकार ने ग्लूफोसिनेट टेक्निकल नाम के इस रसायन पर प्रतिबंध लगा दिया है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि सरकार ने हाल ही में सस्ते मूल्य पर मिलने वाले खरपतवारनाशक ग्लूफोसिनेट टेक्निकल के आयात पर रोक लगा दी है। आंकलन यह है, कि सरकार ने यह फैसला घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से किया है।

ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का इस्तेमाल किस के लिए किया जाता है 

किसान ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का उपयोग खेतों से हानिकारक खरपतवार को नष्ट करने या हटाने के लिए करते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ किसान इसका इस्तेमाल पौधों के शानदार विकास में भी करते हैं। ताकि फसल से ज्यादा से ज्यादा मात्रा में उत्पादन हांसिल कर वह इससे काफी शानदार कमाई कर सकें। 

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ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल का आयात प्रतिबंधित 

ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल पर प्रतिबंध का आदेश 25 जनवरी, 2024 से ही देश भर में लागू कर दिया गया है। ग्लूफोसिनेट टेक्निकल केमिकल पर प्रतिबंध को लेकर विदेश व्यापार महानिदेशालय का कहना है, कि ग्लूफोसिनेट टेक्निकल के आयात पर प्रतिबंध मुक्त से निषेध श्रेणी में किया गया है।

उन्होंने यह भी कहा है, कि यदि इस पर लागत, बीमा, माल ढुलाई मूल्य 1,289 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा होता है, तो ग्लूफोसिनेट टेक्निकल का आयात पूर्व की भांति ही रहेगा। परंतु, इसकी कीमत काफी कम होने की वजह से इसके आयात को भारत में प्रतिबंधित किया गया है। 

इस घास से किसानों की फसल को होता है भारी नुकसान, इसको इस तरह से काबू में किया जा सकता है

इस घास से किसानों की फसल को होता है भारी नुकसान, इसको इस तरह से काबू में किया जा सकता है

भारत में खेती-किसानी से काफी मोटी आमदनी अर्जित करने के लिए मुनाफा प्रदान करने वाली फसलों समेत हानि पहुँचाने वाली फसलों का भी ख्याल रखना बहुत आवश्यक होता है। क्योंकि एक छोटी घास भी काफी बड़ी हानि पहुंचाती है। इसी मध्य आपको एक ऐसी ही घास के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी वजह से फसल को 40 प्रतिशत तक हानि पहुंच सकती है, जिससे बचना काफी जरूरी हो जाता है। बतादें, कि देश में कृषि के अंतर्गत फसलों में सर्वाधिक हानि खरपतवारों की वजह मानी जा रही है। यह हानिकारक घास पौधों का पोषण सोखकर उनको कमजोर कर देती है। साथ ही, कीट-रोगों को भी निमंत्रण दे देती है, जिसके वजह से फसलों की पैदावार 40 प्रतिशत कम हो जाती है।

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टमाटर की किस्में, कीट एवं रोग नियंत्रण गाजर घास खेतों में तबाही मचाने वाली इन्हीं परेशानियों में सम्मिलित है, जिसके संपर्क में आते ही फसलें ही नहीं लोगों का स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित होती है। इस प्रकार के खरपतवारों पर नियंत्रण करने के लिए कृषि विशेषज्ञों की ओर से निरंतर प्रबंधन एवं निगरानी करने की राय दी जाती है। जिससे कि किसान भाई अपनी फसल में वक्त से ही खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सके। साथ ही, फसलों में हानि होने से रोकी जा सके।

गाजर घास से क्या-क्या हानि होती है

बेहद कम लोग इस बात से अवगत हैं, कि खेतों में गाजर घास उगने पर फसलों के साथ-साथ किसानों के स्वास्थ पर भी दुष्प्रभाव पड़ा है। इसके संपर्क में आते ही बुखार, दमा, एग्जिमा और एलर्जी जैसी बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। यह घास फसलों की पैदावार और उत्पादकता पर प्रभाव डालती है। विशेष रूप से अरण्डी, गन्ना, बाजरा, मूंगफली, मक्का, सोयाबीन, मटर और तिल के साथ साथ सब्जियों सहित बहुत सारी बागवानी फसलों पर इसका प्रभाव देखने को मिलता है। इसके चलते फसल के अंकुरण से लेकर पौधों का विकास तक संकट में रहता है। इसके प्रभाव की वजह से पशुओं में दूध पैदावार की क्षमता भी कम हो जाती है। इसकी वजह से पशु चारे का स्वाद भी कड़वा हो जाता है। साथ ही, पशुओं के स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ने लगता है। कहा जाता है, कि फसलों पर 40 प्रतिशत तक की हानि होती है।

नुकसानदायक गाजर घास भारत में कैसे आई थी

बतादें, कि यह घास भारत के प्रत्येक राज्य में पाई जाती है। यह लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर में फैली हुई है। यह घास खेत खलिहानों में जम जाती है। आस-पास में उगे समस्त पौधों का टिकना कठिन कर देती है, जिसके चलते औषधीय फसलों के साथ-साथ चारा फसलों की पैदावार में भी कमी आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह घास भारत की उपज नहीं है। यह वर्ष 1955 के समय अमेरिका से आयात होने वाले गेहूं के माध्यम से भारत आई। समस्त प्रदेशों में गेहूं की फसल के माध्यम से फैली है।

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गाजर घास को किस तरह से नियंत्रण में लाया जा सकता है

गाजर घास को नियंत्रित करने हेतु बहुत सारे कृषि संस्थान और कृषि वैज्ञानिक जागरुकता अभियान का संचालन करते हैं, जिससे जान-मान का खतरा नहीं हो सके। साथ ही, एग्रोनॉमी विज्ञान विभाग खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर और चौधरी सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और हिसार किसानों से जानकारियां साझा कर रहे हैं। वहीं, कुछ कृषि विशेषज्ञ रोकथाम करने हेतु खरपतवारनाशी दवायें जैसे- सोडियम क्लोराइड, सिमाजिन, एट्राजिन, एलाक्लोर और डाइयूरोन सल्फेट आदि के छिड़काव की सलाह दे रहे हैं। इसके अतिरिक्त इसके जैविक निराकरण के तौर पर एक एकड़ हेतु बीटल पालने की राय दी जाती है। प्रति एकड़ खेत में 3-4 लाख कीटों को पालकर गाजर घास का जड़ से खत्मा किया जा सकता है। चाहें तो जंगली चौलाई, केशिया टोरा, गेंदा, टेफ्रोशिया पर्पूरिया जैसे पौधों को पैदाकर के भी इसके प्रभाव से बचा जा सकता है।

गाजर घास के बहुत सारे फायदे भी हैं

वैसे तो गाजर घास खरपतवारों के तौर पर फसलों के लिए बड़ी परेशानी है। परंतु, इसमें विघमान औषधीय गुणों की वजह से यह संजीवनी भी बन सकती है। किसान इसका उपयोग वर्मीकंपोस्ट यूनिट में किया जा सकता हैं। जहां यह खाद के जीवांश एवं कार्बनिक गुणों में वृद्धि करती है। साथ ही, एक बेहतरीन खरपतवारनाशक, कीटनाशक और जीवाणुनाशक दवा के रूप में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मृदा के कटाव को रोकने के लिए भी गाजर घास की अहम भूमिका है। इस वजह से किसान सावधानी से गाजर घास का प्रबंधन कर सकते हैं।